Thursday, 14 August 2008

पहचान

1

जिनकी कोई पहचान नहीं होती
वे खोजते रहते हैं उसे
किताबों में
हाथ की लकीरों में
अजनबी चेहरों में
और आने वाली पीढ़ी में।


2

अजनबी चेहरों में
खोजते रहते हैं हम
अपनी पहचान तमाम उम्र
और जो हमारे हाथ लगता है
वह एक मसखरा होता है
जिसका कोई चेहरा नहीं हुआ करता
और खो देते हैं हम
अपनी रही सही पहचान भी।

8 comments:

PREETI BARTHWAL said...

जिनकी कोई पहचान नहीं होती
वे खोजते रहते हैं उसे
किताबों में
हाथ की लकीरों में
अजनबी चेहरों में
और आने वाली पीढ़ी में।

अच्छा लिखा है आपने, बधाई हो

vijay gaur/विजय गौड़ said...

खूब परिभाषा गढ रहे हो। लेकिन एक बात- परिभाषाऎं बिना परिपक्व अनुभव के संभव है क्या ?

महामंत्री-तस्लीम said...

गागर में सागर भरती रचनाएं हैं। बहुत बहुत बधाई।

Udan Tashtari said...

बहुत गहरी रचना, वाह!! बधाई.

सुशील कुमार छौक्कर said...

कह तो सही रहे हो दोस्त। बहुत गहरी बात कह गये आप।

दिनेशराय द्विवेदी said...

दोनों बहुत सुंदर रचनाएँ।

Gyandutt Pandey said...

सच है - जो अन्दर होता है उसे बाहर खोजते हैं। और यह जानने का यत्न नहीं करते कि अन्दर क्या है?!

Sanjeet Tripathi said...

अंदर तक घायल कर देते हो यार।