Wednesday, 6 August 2008

पुराना सामान

इस चहारदीवारी के भीतर
अनाप-शनाप सामान की तरह
तुम भी भर दी गई हो
रोज़ वही दीवारें, वही सामान
वही तुम

अब इतने बरसों बाद
हम मिलते हैं एक-दूसरे से
रेडियो-टीवी की तरह
मेरी पुरानी साइकिल
आमंत्रण नहीं देती अब
हम एक-दूसरे को देखते हैं पलभर
थकान भरी आखों से
और फेर लेते हैं मुँह

ये सब सामान
जो मैंने शौक से इकठ्ठे किये
मुझे भर देते हैं ऊब से
इन्हें रोज़ वहीं पड़े देखना
मेरी आदत है बीते कई सालों से

एक दिन
तुम मर जाओगी
ठीक वैसे ही जैसे
इस सामान को निगल जाएगा समय
और फ़िर सबकुछ
मेरी यादों में तह हो जाएगा
धूल फ़ांकती
किसी पुरानी किताब की तरह

8 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

अनुराग said...

सच लिखा है या किसी की पीड़ा या एक आत्मग्लानि .....जो भी है ...सवेंदना से भरा है

बाल किशन said...

"सच लिखा है या किसी की पीड़ा या एक आत्मग्लानि .....जो भी है ...सवेंदना से भरा है"
अनुराग जी से सहमत हूँ.

सुशील कुमार छौक्कर said...

वक्त बदलता हैं आदमी बदलता हैं पाँच रुपये की साफ्टी की जगह 15 रुपये की चौकबार लेती है।
महेन जी आपने पीड़ा को कितने अच्छे बोल दिये हैं।
ऐसा ही होता हैं।

swati said...

khadi boli avem adhunik

Mired Mirage said...

बहुत जटिल लिखते हो। पता नहीं ठीक समझी या नहीं। जितना समझी अच्छा लगा।
घुघूती बासूती

अखिल तिवारी said...

वाह बंधु, बहुत अच्छी लिखी है..

हम एक-दूसरे को देखते हैं पलभर
थकान भरी आखों से
और फेर लेते हैं मुँह

बिल्कुल यही हो रहा है.. अक्षशः..

अजित वडनेरकर said...

सुंदर अभिव्यक्ति बंधु...