Monday, 4 August 2008

प्रोफ़ेश्नलिज़्म और पढ़ा-लिखा आदमी

प्रोफ़ेश्नलिज़्म का पढ़ाई से कितना लेना-देना है? ज़्यादा नहीं, ऐसा मुझे लगता है। सैकड़ों उदाहरण जमा हो गए हैं मेरे पास। ज्ञान जी की पिछली पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए अचानक इस बारे में भी सोचने लगा और तभी से लगातार सोच रहा हूँ। मेरे घर में पिछले करीब दो सालों से एक कुक मेरे अपने फ़्लैट में शिफ़्ट होने तक (मैं अपने घर में फ़रवरी में शिफ़्ट हुआ) काम कर रही थी। खाना बनाने में वह शैफ़ाली की कसौटी पर खरी उतरी। शैफ़ाली के खाने के पंजाबी शौक होने और कुक के तमिल होने की वजह से यह बहुत मुश्किल था, मगर उसने कभी निराश नहीं किया। मज़े की बात कि उसका नाम भी अन्नपूर्णा है। कई बार ऐसा हुआ की हमारी सफ़ाई करने वाली बाई बगैर बताए नहीं आती थी। ऐसे हर मौके पर अन्नपूर्णा बग़ैर हमारे कुछ कहे सारे बर्तन-भांडे भी धो देती थी और पूरे घर की भी सफ़ाई कर देती थी। हम ऐसे हर मौके पर उसे यह सब काम करने के लिये मना करते रहे, पैसे की बात तो बहुत दूर की है। जब भी हमनें कहा कि हम ऐसे अचानक आ पड़े काम के लिये उसे अलग से पैसे देंगे तो वह साफ़ मना कर देती और कहती “पैसे की बात करके मुझे छोटा ना करें।” यह एक टयूनिंग तो थी ही हम लोगों के बीच में क्योंकि उसे ज़रूर लगता होगा कि हम उसका बेज़ा इस्तेमाल नहीं करेंगे और दूसरी ओर हम इस ओर से जागरूक थे कि उसे उसकी मेहनत का उचित मुआवज़ा मिले। तमाम तंगी के बीच वह अपनी इकलौती संतान (लड़की) को एक छोटे स्तर के पब्लिक स्कूल में पढ़ा रही है और अकसर सत्र के शुरु में उसे एक साथ फ़ीस भरनें में दिक्कत होती है। पिछली बार उसने हमसे उधार मांगा। जब हमें उधार मांगने का कारण पता चला तो मैंने शैफ़ाली से कहा कि उधार देने की ज़रूरत नहीं है। हम फ़ीस ही भर देंगे, जिसपर शैफ़ाली तुरंत तैयार हो गई। यह दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर सहज विश्वास की वजह से हुआ और इस विश्वास के उपजने की वजह क्या अन्नपूर्णा का प्रोफ़ेश्नलिज़्म नहीं है? कारपोरेट-जगत में अकसर पहले आपको अपनी अपरिहार्यता सिद्ध करनी होती है, उसके बाद ही कंपनी आपका विश्वास भी करती है और आपका महत्व भी समझती है। यह सिद्धांत हर जगह लागू होता है; मुख्य सिद्धांत के रूप में कारपोरेट-जगत में भी और घरेलू नौकरों के साथ भी जो इस बारे में संभवत: कोई सिद्धांत भले ही न गढ़ पाएँ, मगर कई अपने व्यवहार में इसे जाने-अनजाने अपनाते हैं। ऐसी ही एक सफ़ाई वाली बाई भी थी हमारे घर पर जो अन्नपूर्णा की तरह काम के मामले में पूरी तरह प्रोफ़ेशनल है। हम इन दोनों की कमी आज भी महसूस करते हैं अपने घर में। शैफ़ाली ने तो पूरी कोशिश की कि इन दोनों को किसी भी तरह अपने पास ले आए। कुछ आसार तो हैं देखें क्या होता है।
मेरे विदेश-प्रवास के दौरान श्रीमति जी और उनकी माता यहाँ बंगलौर में दुकेले थे। इस बीच कई नए कुक्स और सफ़ाई वाली बाइयों से साबका पड़ा और हर बार शैफ़ाली ने अन्नपूर्णा और नागम्मा को और भी शिद्दत से याद किया। मेरा मानना है कि प्रोफ़ेश्नलिज़्म का पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं। यह कल्चर के रूप में कंपनियां अपने यहाँ लागू तो कर देती हैं और ऊपरी तौर पर उसका रूप भी बहुत प्रोफ़ेशनल लगता है मगर अंदर ही अंदर तमाम तरह की राजनीति चलती रहती है। किसी भी कारपोरेट में आधे से ज़्यादा लोग सच्चे प्रोफ़ेशनल नहीं होते। कम या ज़्यादा यह बात अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे काम करने वालों पर भी लागू होती है, घरेलू नौकरों को मिलाकर मगर अन्नपूर्णा जैसे सच्चे प्रोफ़ेशनल लोग आपको ज़रूर टकराएंगे।
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6 comments:

Gyandutt Pandey said...

ओह, आपकी अन्नपूर्णा के जैसी शान्ती है, जिसके बारे में मैने साल भर पहले लिखा था - नेवस्टी गया है मोनू
और प्रोफेशनलिज्म के लिये पढ़ाई न नेसेसरी कण्डीशन है, न सफीशियेण्ट!

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सहमत हूँ कि प्रोफेशनलिज़्म शिक्षा की देन नहीं है यह व्यवहार की बात है. अच्छा आलेख.

दिनेशराय द्विवेदी said...

महेन जी, प्रोफेशनलिज्म एक संस्कार है। इसे व्यक्ति कहाँ से प्राप्त करता है यह तो पता नहीं, मगर यह जीवन भर उस का साथ नहीं छोड़ता।

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी ये बिल्कुल सही है कि प्रोफेशनलिज्म शिक्षा देन नहीं हैं। एक अच्छा उदाहरण भी दिया आपने। पर ऐसे उदाहरण अब कम होते जा रहे है। यह प्रोफेशनलिज्म शब्द हम सारे दोस्त बडा इस्तेमाल करते थे।

अनुराग said...

जी हाँ इसे कही सिखाया नही जाता

Mired Mirage said...

संस्कार कहें या कुछ मनुष्य का अपना स्वाभाविक गुण, परन्तु यह गुण या तो होता है या नहीं, जबर्दस्ती किसी में भरना बहुत कठिन होता है।
घुघूती बासूती