Sunday, 3 August 2008

वे सब हमारे ठाने हुए द:ख थे

कितने बदनसीब थे हम
कि सोते रहे फूलों की सेज पर
और गाते रहे
बहती नदियों के किनारे बैठकर खिलखिलाते गीत
जब चाँद लुट रहा था
अपनी तमाम सुँदरता और धब्बों के साथ
हम गुलज़ार किये थे
सनमख़ानों में आराईशी ख़ियाबां
हमनें कब परवाह की
किस गिर्दाब में गुमगश्ता है ख़ाम ज़िंदगी
हमारे गले तक भरी हुई थी शराब
मुँहभर गालियों के साथ
हम गाते रहे
अपनी बिछड़ गई प्रेमिकाओं के शोकगीत
और रोते रहे
फ़िर अकेले छुट जाने का अफ़सोस
नीम नशे में हमनें कोसा अपने वजूद को
और उन माओं को
जिन्होनें हमें पैदा किया अजाने
उन पिताओं को भी नहीं बख़्शा
जो पराए लगे ज़िंदगीभर
कोठे के रंगीन अन्धेरे कोनों में
झुरझुराते चाँद के नीचे सुनते रहे
किसी की कच्ची-पक्की तानें
लुटाते रहे
अपने अधपके इल्म की अधजली वाहवाही
कूड़े के ढेर पर जब ज़िंदगी
अपने होने की तस्दीक़ कर रही थी
हम मसरूफ़ थे
अपने वजूद के हवाले देने में
और किसी की नकली भावनाओं को
अपने अब्तरी आंसुओं से चरितार्थ करने में
ताउम्र इस तौर रंजीदा थे हम
कि जाना ही नहीं क्या होती है तकलीफ़
इस कदर डूबे रहे हम अपने दु:खों की रूमानियत में
कि रोने में ही सुख मिला किया हमें
जिन्होनें आफ़तें देखी नहीं
वे हम थे
हमारी आत्मा से जो टपकते थे
वे सब हमारे ठाने हुए नकली दु:ख थे

8 comments:

तरूश्री शर्मा said...

महेन,
आपने बहुत अच्छा लिखा है... बहुत समय बाद एक अच्छी कविता पढ़ने को मिली। सच कहते हैं आप असली दुख तो अभी हमने देखे ही कहां हैं..... कहते हैं ना कि सभी को अपना दुख ज्यादा लगता है, कुछ इसी तर्ज पर जीते हैं हम।

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी क्या कहूँ। पढकर शब्द नही मिलते आपकी रचना की वाह वाह के लिए। बस हम पढ़ जाते हैं और लूट जाते हैं।

Gyandutt Pandey said...

यह कविता पढ़ अपने स्तर पर कुछ महसूस कर ले रहा हूं, पर बहुत सार्थक टिप्पणी के योग्य नहीं पाता स्वयम को।

Mired Mirage said...

कविता में बहुत से उर्दु के शब्द समझ नहीं आए परन्तु जितनी समझ आई बहुत अच्छी व सही लगी।
घुघूती बासूती

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इस कदर डूबे रहे हम अपने दु:खों की रूमानियत में
कि रोने में ही सुख मिला किया हमें
जिन्होनें आफ़तें देखी नहीं
वे हम थे
हमारी आत्मा से जो टपकते थे
वे सब हमारे ठाने हुए नकली दु:ख थे

बहुत सुंदर लिखा है ...लाजवाब

poemsnpuja said...

इस कदर डूबे रहे हम अपने दु:खों की रूमानियत में
कि रोने में ही सुख मिला किया हमें" बेहतरीन पंक्तियाँ. वाकई दुःख से तो पला पड़ा ही नहीं है, हम अपने काल्पनिक दुखों को एक रूमानी जामा पहनाये रखते हैं, और डूबे रहते हैं. बहुत अच्छी कविता.

rajnish upadhyay said...

बहुत अच्छी कविता है महेन जी. अापको पहली बार पढा. समसामियक है- सामािजक दायरे मे िफट बैठती है. ये सब हमारे ठाने हुए दुख थे. हम बाहर कहां झांक पाते हैं.
रजनीश उपाध्याय, पटना

मीनाक्षी said...

हमारी आत्मा से जो टपकते थे
वे सब हमारे ठाने हुए नकली दु:ख थे ---- सच है..दूसरे के दुख को देखकर ही अपने दुख नकली लगने लगते हैं.. ऐसा सोचने से ही जीना आसान हो जाता है.