Friday, 1 August 2008

पहाड़, शहर और तुम

एक ओर वह शहर है
जहाँ मैं रहता हूँ
दूसरी ओर वे पहाड़
जहाँ मैं पैदा हुआ
इन दोनों के बीच हो तुम
मैं मानव हूँ
मुझे बेहद प्यार है
तुमसे, अपने शहर से और अपने पहाड़ों से
जबतक ज़िंदा हूँ
भूलेगी नहीं पहाड़ों की दुर्गमता
शहर की कुटिलता भी नहीं बिसरेगी
अपने हर ऐब के साथ वे
मेरे ही रहेंगे
मैं उन्हें उसी तरह प्यार करूँगा
जैसे तुम्हें चूमता हूँ हर बार
पिछली रात की तुम्हारी
असहज चुप्पी तोड़ने के लिये।

9 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पिछली रात की तुम्हारी
असहज चुप्पी तोड़ने के लिये।

बहुत खूब ...बहुत सुंदर

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत खूबसूरत।

बाल किशन said...

सुंदर अभिव्यक्ति.

Gyandutt Pandey said...

इस कविता से इतर - मेरे मन में एक ख्वाब है। ये पहाड़ों वाले प्रान्त इज्राइल की तरह मजबूती का न्यूक्लियस बन सकते हैं। मनीआर्डर अर्थव्यवस्था का बिल्कुल उलट हो सकता है।
मैं कसौली में कुछ समय रहा हूं और उस समय अपनी एफीशियेंसी बहुत बढ़ी पाता था।
मैं कल्पना करता हूं उत्तरांचल के मजबूत प्रान्त के रूप में उभरने की!

Gyandutt Pandey said...

इस कविता से इतर मेरे मन में एक स्वप्न है। ये पहाड़ के प्रान्त इज्राइल की तरह मजबूती का न्यूक्लियस बन सकते हैं। मनीआर्डर अर्थव्यवस्था का उलट हो सकता है।
पहाड़ों में आदमी की कार्यक्षमता चौगुनी होती है। संसाधनों का प्रयोग, मेहनत और दिमाग का इस्तेमाल उस दिशा में हो।
मेरा स्वप्न कभी न कभी सच होगा।

अखिल तिवारी said...

वाह भाई, अभी सब पढ़ी. कुछ दिन से दूर था यहाँ से. आज आके पढ़ी और कसम से.. मज़ा आ गया. बहुत अच्छा लिखते हो आप..लिखते रहिये..

Sanjeet Tripathi said...

आपकी रचनाओं पर कुछ कह पाने के लिए अपने आप को बहुत ही छोटा पाता हूं।

शायद आपकी रचनाएं पढ़कर फिर से एक बार सीखने-समझ की कोशिश का भाव आ रहा है मुझमें।
शुक्रिया।

सोतड़ू said...

आज एक बार फिर पढ़ी... बहुत ख़ूबसूरत है। धीरेश को जो कुछ सुनाई थीं- ये उनमें से एक थी.... अतिशुंदर

Ek ziddi dhun said...

एक प्रिय भाव या चीज या मुनष्य या कुछ भी प्रिय हमें दूसरें प्रियों की भी याद करा देता है। पहाड़ और किसी प्रिय को चूमना...और कविता पढ़कर मुझे अपने कई प्रिय दोस्त, जगहें, दिन याद आ रहे हैं