Thursday, 3 July 2008

लड़कियाँ सिर्फ़ सामान हैं तुम्हारा

तुम्हारी लड़कियाँ सिर्फ़ सामान हैं तुम्हारा
और कौनसा दरजा देते हो तुम उन्हें?
तुम्हारी लड़कियाँ पगड़ी में लिपटी हुई इज़्ज़त होती हैं सिर्फ़
इसलिये उन्हें कलफ़ करके चमकाया जाता है;
हर पगड़ी की फनफनाती कलगी दरअसल
किसी सुशील लड़की का झुका हुआ सिर होती है;
उन लड़कियों को उनके दहेज के साथ
सहेजकर रख दिया जाता है बंद दीवारों में
आने वाले कुछ सालों के लिये
ताकि जब वे पूरा सामान बनकर बाहर निकलें
उन्हें सजाकर रखा जा सके ड्राईंग-रूम की पेंटिंग के नीचे
अपने दहेज के सामान की लिस्ट के साथ
और पूरे दहेज में उनके सबसे आकर्षक होने की प्रार्थना की जाती है।
मगर इससे भी पहले जैसे लकड़ी ठोंककर भरी जाती है हथौड़े के सिर में
तुम उनके शब्दकोश में भर देते हो एक वाक्य
कि उनके लिये प्रेम और काम अकरणीय हैं
और सिखाते हो कि कौमार्य ही है उनकी मुक्ति का अंतिम मार्ग;
मगर तुम यह सीखाना तो भूल ही जाते हो हर बार
कि यह सहेजा हुआ कौमार्य कैसे समर्पित किया जाता है
अपने मुक्ति के देवता के चरणों में,
क्योंकि तुम्हारी महान संस्कृति चौंसठ कलाएँ गढ़ने के बाद भी
तालिबानी युग में जी रही है।
जब बरसों का एक भूखा भोगता है तुम्हारी कन्याओं को
तो उनकी रक्त रंजित दुविधाओं पर मनाते हो तुम उत्सव
और महसूस करते और कराते हो उनके अस्तित्व की सार्थकता।
यह कैसा खेल है कि तुम अपनी कुँठाएं तक खुद लादकर नहीं चल सकते
और बिसात पर उनको ठेलते रहे हो जिनके तुम संरक्षक हो,
क्योंकि मानवीयता के तमाम शास्त्रों ने नहीं गढ़े कोई सिद्धांत
संरक्षितों के आवश्यकतानुसार दोहन पर;
और कैसे उत्सव हैं तुम्हारे कि चीत्कारों पर गाते हो मंगलगान
और सीत्कारों पर अमर्ष राग।
तुम्हारे इस आधी आबादी पर किये अनाचारों की
यह तो सिर्फ़ प्रस्तावना है
जिसके कर्ता, कारक और कारण तुम स्वंय हो
वरना इस आबादी पर
जो हथियार तुमने ताने हुए हैं सदियों से
उनकी घातकता तो मानव इतिहास के सभी युद्धों से ज़्यादा है।

13 comments:

मीत said...

आप की बतियाँ बड़ी तीखी हैं महेन साहब, चोट करती हैं. मैं ज़्यादा posts पढ़ता नहीं - बस दो चार कवितायें अगर जी को भायें और अगर कोई पसंद का गीत मिल जाए ....... आप की कवितायें ज़रूर पढूंगा ....... बहुत बढ़िया.

रंजू ranju said...

बहुत कड़वी सच्ची बात लिख दी है आपने ..

DR.ANURAG said...

सच बात ....मैंने बड़े बड़े लोगो को असल जीवन में स्त्री को एक समान की तरह इस्तेमाल करते देखा है...तोलस्तोय इसका जीवंत उदारहण है...
कभी एक कविता मैंने भी लिखी थी

आदमी पहुँच जाए चाहे चाँद तारो पर
उसकी सोच का दायरा मगर जिस्म ही है.....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Jeevan ki katu sachchaaiyon ka dastavej hai ye kavita.

Parul said...

takleefdeh baat bhi kabhi kabhi jee khush kar jaati hai..

सुशील कुमार छौक्कर said...

सही जगह चोट मारी है। महेन यही है वह कारण जो तुम्हारा लिखा पढ्ने का मन करता है। हर लफ्ज चीख चीख कर कुछ कहता है। महेन आपकी कलम को और आपको सलाम।

Sanjeet Tripathi said...

हजूर कलम मे इतनी धार और शब्दों मे पैनापन कहां से लाते हो यार।

महेन said...

धन्यवाद मीत जी। आते रहें, अच्छा लगता है जब प्रोत्साहन मिलता है। अनुराग जी आपने लाखों की बात दो लाईन में समेट दी… अद्भुत। पारुल जी जी को खुश ना भी करे तो भी उद्वेलित और विचलित तो कर ही देती है तक़लीफ़देह बातें। सुशील जी और संजीत जी जब अंदर आग हो तो धुँआ बाहर निकलता ही है… शायद ऐसा ही कुछ कारण है। ज़ाकिर जी आपको भी धन्यवाद।

अभिषेक ओझा said...

aapki lekhani vichlit to karti hi hai... ander bahut aag hai iska anubhav to posts padh ke ham kar hi chuke hain. likhte rahein.

महामंत्री-तस्लीम said...

जीवन के कटु सत्य उजागर करती कविता है। बधाई।

अजित वडनेरकर said...

अच्छी कविता .....
महेन , यहां आना अच्छ लगा हमें।

Chhiyaishi said...

bahut achi kavita hai..Anurag ji ke blog ke thru aap ka likha hua padha hai. har baat sach hai aur dukhad bhi. yeh dekhkar acha lagta hai ki kam se kam inhe duniya ke samne laane wale log badh rahe hain.

Harihar said...

मेहन जी, आपके तीखे शब्दों की चोंट से अब तक मैं
अपने को घायल महसूस कर रहा हूं । इस तरह घायल होने का भी अपना ही मजा है