Tuesday, 29 July 2008

पहाड़

पहाड़ साथ नहीं जाते किसी के
वे वहीं खड़े रहते हैं जैसे टूटा हुआ पिता
झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
जो धकेले जा चुके हैं
उनके पीछे छुटे सामान के साथ
आबाद रही पगडंडियों पर रखे हैं हरे घाव
किसी की स्मृति में नहीं रहते वे
न रखते हैं किसी की याद
अपने पथरीले जिस्म में
वे खड़े रहते हैं
बगैर किसी के लौट सकने की
गुँजाईश के साथ

पहाड़ वहीं खड़े रहते हैं
जैसे टूटा हुआ पिता झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
और पहाड़ वे पिता हैं
जो और उठ उठ जाते हैं
खुद को अकेला पाकर
उनकी जड़ें व्याप्त हैं
उनके अस्तित्व से भी आगे
जितने ऊँचे हैं वे
उससे भी ज़्यादा गहरे हैं

12 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना है. बहुत खूब. बधाई.

Gyandutt Pandey said...

वाह, आपने तो दूसरे कोण से लिखा, पर मुझे वाल्तर डि ला मेयर की कविता याद आ गयी - "सान्ध्य गुलाबों से रंजित है, जिनकी भीषण दुर्गमता... "
पहाड़ केपेबल हैं तरह तरह के इमोशंज का पोषण - परिवर्धन करने को!

मीत said...

बहुत बढ़िया !!

सुशील कुमार छौक्कर said...

पहाड़ वहीं खड़े रहते हैं
जैसे टूटा हुआ पिता झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
और पहाड़ वे पिता हैं
जो और उठ उठ जाते हैं
खुद को अकेला पाकर
उनकी जड़ें व्याप्त हैं
उनके अस्तित्व से भी आगे
जितने ऊँचे हैं वे
उससे भी ज़्यादा गहरे हैं

महेन जी क्या बात कही हैं इन शब्दों में। अजी मान गऐ। आप कितना भी झूठलाऐ । बहुत खूब।

Shiv Kumar Mishra said...

उनकी जड़ें व्याप्त हैं
उनके अस्तित्व से भी आगे
जितने ऊँचे हैं वे
उससे भी ज़्यादा गहरे हैं

बहुत बढ़िया.

अभिषेक ओझा said...

पहाड़ पर कई कवितायें पड़ी... ज्यादातर प्रेरणा. वाजपयी की एक कविता में घमंडी. आज ये नया विचार भी पसंद आया.


और पहाड़ वे पिता हैं
जो और उठ उठ जाते हैं
खुद को अकेला पाकर


ये पहाड़ कितना कुछ कह जाता है... बस नज़र चाहिए देखने की.

swapandarshi said...

badhiyaa

बाल किशन said...

सुंदर!
अति सुंदर!
बहुत ही भावपूर्ण और गहरी रचना.
शानदार.

poemsnpuja said...

दर्द को यूँ तटस्थ भाव से देखना और बयान करना...अद्भुत है

Parul said...

pahaad badey rahasyamayi lagtey hain ...bhaav alag se hain yahan

मुनीश ( munish ) said...

SUNDAR BHAAV! PAATH YOGYA HAI.VAAH.

महेन said...

मुनीश भाई, पाठ योग्य होने के लिये तो यह कविता बहुत ही छोटी है, मुझे ऐसा लगता है। हां ये बात और है कि आप जैसे अनुभवी इसमें भी कुछ निकाल लें।