Thursday, 3 July 2008

चाकू सर को याद करते हुए

किसी को याद करना भी एक कला ही होती होगी। मैं इस कला में निरा ठस हूँ। अतीत की ओर कभी क्षोभ से देखता था पर धीरे-धीरे रूमानियत से देखना सीख गया या शायद परिस्थितियों ने सिखा दिया। कहीं पढ़ा था, “There is no harm in visiting your past, but make sure that you don’t bring any luggage with you.” मैं तो पूरा घर ही उठा लाता हूँ अपने साथ। कितना तो सुनहरा होता है अतीत हमेशा; मेरा, सभी का। अतीत पेजमेकर की तरह है। वह आपको वैसी ही तस्वीर दिखायेगा जैसी आप गढ़ना चाहेंगे।
कई बार यूँही बैठे-बैठे अतीत के दस्तावेज़ टटोलने लगता हूँ तो ऐसी चीज़ें हाथ लग जाती हैं जो मैंने खुद भी पहले नहीं देखी थीं, जाने क्यों? बहुत अच्छा लगता है।
आज पता नहीं क्यों चाकू सर (यही नाम दिया था हमनें उनको। वे हमें एकांट्स पढ़ाया करते थे और क्लास टीचर भी वही थे।) और सोहन याद आ रहे हैं बेतरह। मैंने दसवीं के बाद स्कूल बदल लिया था। सारे संगी साथी छूट गए; बस मैं और उन दिनों का मेरा एक पक्का दोस्त। पहुँचे दूसरे स्कूल। वह जो उम्र होती है, उसमें ऐसी अद्बुत सहजता होती है कि दोस्त बनाने में और दिल जुड़ाने में वक़्त नहीं लगता। पता भी नहीं कि कब बाईस नए लोगों से जुड़ गया। ऐसी आत्मीयता मिली उन सब लोगों से कि अब अठ्ठारह साल बाद भी रह रह कर याद आते हैं वे चेहरे। अफ़सोस कि अब उनमें से किसी से भी संपर्क नहीं रह गया है।
उनमें से एक चेहरा बड़ा आत्मीय और खास था – सोहन। एक ही चुटकुलेबाज़ था। जब वह चुटकुले सुनाने बैठता तो चौबीस लड़कों की क्लास में सुईपटक सन्नाटा छा जाता था। ऐसी शांति एसेंबली में भी नहीं रख पाती थी हमारी पूरे स्कूल में कुख्यात क्लास। सोहन ही था जिसे मैं आज से तकरीबन नौ साल पहले यकायक फ़िर टकरा गया था। कनाट प्लेस में बाराखंबा रोड पर गोपालदास बिल्डिंग के नीचे बस स्टैंड हुआ करता था। वहाँ से मैं और मेरी एक सहपाठिनी रात आठ बजे के करीब मैक्स म्युलर भवन में जर्मन की क्लास खत्म होने के बाद नौएडा के लिये बस पकड़ते थे। एक दिन ऐसे ही हम बस के इंतज़ार में एक स्टाल से बर्गर खा रहे थे (जोकि उन दिनों मेरे लिये luxury होता था) कि अचानक देखा एक जाना पहचाना व्यक्ति। मुझे देखते ही लगा यह सोहन ही है। मैं भागकर उसके पास गया मैनें उसके कंधे पर हाथ रखा तो वह पलटा और मेरे मुँह से निकला, “सोहन?”। मगर हैरान रह गया जब उसके चेहरा सपाट बना रहा और उसी सपाट चेहरे से उसने कहा, “महेन्द्र।” थोड़ी निराशा हुई वरना मेरी आत्मीयता तो चाह रही थी कि उसे कसकर गले लगाकर दुनियां को बताऊँ कि मुझे अपना दोस्त मिला है सात साल बाद। खैर हाथ मिलाया और पूछा क्या कर रहा है। वह टाल गया और मेरे बारे में पूछने लगा। मैनें पूरे उत्साह से (जिसमें मैं हमेशा पाया जाता हूँ) बताया कि फ़िलहाल जर्मन सीख रहा हूँ। बाकी दोस्तों के बारे मैं भी कुछ खबर मिली उससे। ज़्यादातर लोग आई एन ए के आसपास रहते थे इसलिये एक दूसरे से संपर्क में रहते थे और मैं मालवीय नगर में रहता था सो उन लोगों से संपर्क में नहीं रह पाता था। स्कूल के समय तक टेलीफ़ोन लक्ज़री ही हुआ करते थे। इस दौरान उसकी नज़र मेरे पार कुछ और देख रही थी। पता नहीं क्या? एकबार फ़िर पूछा क्या कर रहा है। उसने बताया कि कहीं किसी कंपनी में एकाउंट्स का काम कर रहा है। मैनें पूछा कि चाचा के पास यू के जाना चाहता था उसका क्या हुआ? उसने ऐसे देखा जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो कि ये चाचा कौन हैं मगर होंठ टेड़े करके चुप हो गया। बड़े भाई के बारे में पूछा तो फ़िर वही टेड़े होंठ। मेरा उत्साह इतना ज़्यादा था कि उसकी मुझसे मिलने की अनिच्छा भी मैं नहीं समझ पाया। बस यही सोचता रहा कि पाँच मिनट की मुलाकात में उसने एक भी चुटकुला नहीं सुनाया। मैनें नंबर मांगा तो उसने उलटा मेरा नबर मांगा। वादा लिया कि फ़ोन करेगा। अगले कई दिनों तक माँ से पू्छता रहा कि कहीं मेरे लिये मेरे पीछे किसी का फ़ोन तो नहीं आया था? फ़ोन न आना था न कभी आया। जब लगने लगा कि कुछ ज़िंदगी का बोझ और कुछ अपनी नाकामयाबी उसके सपाट चेहरे पर लिखी हुई थी जो मैं पढ़ नहीं पाया था तो एक दिन बस में से मुझे उसका चेहरा दिखा, मगर जबतक आवाज़ लगाता बस बहुत दूर निकल चुकी थी। थोड़ी ही दूर खाली खाली सा बस स्टेंड होता था, जहाँ बस कभी कभी ही रुकती थी। सोचा अगर रुके तो उतर जाऊँगा और दौड़कर उसे पकड़ लूंगा। मगर बस नहीं रुकी और मैं अगली बार के इत्तेफ़ाक के भरोसे बैठ गया जो आज दस साल बाद भी नहीं आया है। आज हैरान होता हूँ कि किसी तौर बस से उतर जाता तो शायद पता होता कि आज वह कहाँ है। जब हम कुछ खो रहे होते हैं तो खोना देख नहीं पाते।
और याद आते हैं चाकू सर। चार फ़ुटिया चाकू सर जितने छोटे शरीर के स्वामी थे उससे कहीं बड़ी शख़्सियत के मालिक थे। उनका नाम आर सी शर्मा था। पूरा नाम तो कभी पूछा ही नहीं। एकाउंट्स इतनी सहजता से पढ़ा देते थे जैसे शेक्सपीयर पढ़ रहे हों। उनकी क्लास लंच से पहले हुआ करती थी और हम और वे इतने तल्लीन हो जाते थे कि कई बार पता ही नहीं चलता था कि पीरियड खत्म हो गया है। अगर कभी हमें पता चल भी जाता था तो भी किसी कि इच्छा नहीं होती थी टोकने की। जिस एकाउंट्स से मेरे पिछले स्कूल के साथी परेशान थे और मैं और मेरा दूसरा दोस्त उनके तारणहार बन गये थे, उसे हमने चालीस दिन में पूरा चाट डाला था। हुआ युँ था कि उन दिनों मंडल कमीशन का विरोध बहुत ज़ोरों पर था और दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी सड़कों पर उतर आये थे। जगह जगह वे धरने पर बैठे रहते थे। पहले तो कालेज अनिश्चितकाल के लिये बंद हो गये फ़िर विद्यार्थियों ने स्कूल भी ज़बर्दस्ती बंद करवा दिये। उन दिनों लगभग रोज़ कोई न कोई युवक मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के विरोध में सफ़दरजंग अस्पताल के बाहर आत्मदाह करता था और अक्सर मर भी जाता था। यह सब समझने के लिये हमारी बुद्धि अभी विकसित नहीं हुई थी पूरी तरह। बहरहाल चालीस दिन स्कूल बंद रहे और उन चालीस दिनों की छुट्टियों में मैनें पूरा एकाउंट्स खत्म कर डाला। इससे चाकू सर की नज़र में साख बन गई, हालांकि मैं शुरु के सात आठ अच्छे विद्यार्थियों में भी नहीं आता था मगर एकाउंट्स मेरा पसंदीदा विषय बन गया और मैं चाकू सर का पसंदीदा छात्र। उन्होने शायद ही कभी किसी को डांटा हो या कुछ कहा हो (एक घटना को छोड़कर, जिसका उल्लेख उचित नहीं होगा) मगर उनके व्यक्तित्व में कुछ बात थी कि उनकी नज़र से ही हम थर थर कांपने लगते थे। कभी अगर वे किसी से कोई सवाल पूछ लेते थे तो हम सब उस बच्चे को ऐसे देखते थे जैसे बकरे को हलाल होने से पहले आखरी बार देख रहे हों। अगर जवाब दिया तो ठीक वरना गये। उन्हे उत्तर न मिलने से ही चिड़ थी बस। यह सही भी था क्योंकि वे इतने तफ़्सील से बताते थे कि समझ आना लाज़िमी था और हम उनकी इस खीझ को समझते भी थे। कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी बच्चे ने उनके बारे में कुछ भी बुरा कहा हो। वे सवाल पूछकर ऐसे छील देते थे कि हमारी क्लास के एक जाट ने एक बार कहा, “यो आर के णा सै भाई, यो तो चाक्कू सै चाक्कू।“ बस वो दिन था और आज का दिन है, उनका नाम चाकू ही आता है ज़बान पर। बाकी सारे दोस्त जहाँ भी होंगे उन्हे इसी नाम से याद करते होंगे।
चाकू सर शुरू से इतने कठोर नहीं थे। अपनी ग्यारहवीं पूरी तरह मज़े में निकली थी उनके साथ। परीक्षाओं के बाद छुट्टियाँ पड़ती थीं दो महीने की। उनकी इकलौती संतान उनका बेटा हमारा हमउम्र था। जब छुट्टियों के बाद हम स्कूल आये तो सर का चेहरा देख कर घबरा गये। अजीब सी उदासी थी। नमस्ते का जवाब भी वे बड़े अनमने ढंग से दे रहे थे। आँखों के नीचे काले घेरे बन गए थे और दो महीनों में अपनी उम्र दस साल बढ़ा आये थे। उनसे सीधे पूछते भी नही बन रहा था किसी से। हारकर इकोनोमिक्स वाले डिमरी सर के पास गये सब मिलकर और उनसे पूछा तो पता चला कि उनके बेटे की मृत्यु हो गई। घोर सन्नाटा छा गया था हमारे बीच। कई दिनों तक हमारा स्कूल बंक करना बंद हो गया। सर की खीझ या गुस्सा या दु:ख अकसर हमपर निकल जाता था। वे कई बार पूरे लेक्चर में सिर्फ़ डांटते ही रह जाते थे। पूरी क्लास में एक मूक समझौता था कि सर की डांट चुपचाप खानी है और जाने क्यों ऐसा होता था कि एक को डांट पड़े तो पूरी क्लास अपराध भाव से भर जाती थी। किसी और को यदि जवाब आता भी था तो भी वह उत्तर देकर सर की डांट को भंग नहीं करता था। डांट खाकर ज़्यादा संतुष्टि मिलती थी।
बोर्ड की परीक्षाएँ शुरु होने वाली थीं और तैयारी के लिये हमारी छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं। एक बार स्कूल के अहाते में मिल गये। मैं शायद एडमीशन कार्ड लेने स्कूल गया हुआ था। कंधे पर बड़ी आत्मीयता से हाथ रखकर पूछा, महेन्द्र कितने नंबरों की उम्मीद कर रहे हो एकाउंट्स में? मैनें कहा, सर 90+ तो आएंगे ही। चाहे तो शर्त लगा लें। एक निरीह सी दृष्टि उन्होने मेरी ओर देखा, जैसे कुछ याद सा आ गया हो। फ़िर हंसकर बोले, मैं जानता हूँ तुम ले आओगे। शुभकामनाएं दीं और कंधे झुकाते हुए अंदर चले गये। मैं खड़ा उनको अंदर जाते देखता रहा और सोचता रहा, पता नहीं अब इन्हे दोबारा देख पाऊँगा कि नहीं। नहीं देख पाया दोबारा आजतक। अब कोई उम्मीद भी नहीं है। जब दिल्ली जाता हूँ तो अकसर स्कूल की ओर भी जाता हूँ। दिल्ली हाट के बाजू में ही है। एक बार स्कूल छूटने के वक़्त गया और बच्चों के एक झुंड से पूछा, “आर के शर्मा सर पढ़ाते है क्या यहाँ?” उन्होने हैरानी से मेरी ओर देखकर कहा इस नाम के कोई टीचर नहीं हैं यहाँ।
लौट आया और फ़िर नहीं गया कभी। हालांकि कभी कभी जब वहां से गुज़रता हूँ तो आँखे पुराने अवशेष टटोलने लगती हैं… पुराने दोस्तों के अवशेष, छोटी छोटी बतकहियों के अवशेष, एक चुटकुला जो रास्ते में सोहन से छुट गया था, एकाउंट्स की किताब के पन्नों के चिथड़े और चाकू सर के अवशेष… लौटना अकसर खाली हाथ ही होता है।

10 comments:

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा आपका अतीत यादों में उतरना..काश, आप कभी सोहन से फिर मिल पायें.

अतीत पेजमेकर की तरह है। वह आपको वैसी ही तस्वीर दिखायेगा जैसी आप गढ़ना चाहेंगे।

-क्या बात कही है, बहुत खूब.

सजीव सारथी said...

अरे आपके साथ साथ जैसे मैं भी अपने पुराने दिनों में लौट गया.... बहुत ही सचे अंदाज़ में लिखा है आपने.... बढ़िया

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन
आपके अतीत में झांकना अच्छा लगा। मन और झलकियां देखने का करता है। आप सोहन से जल्दी ही मिले ऐसी दुआ करते है और ये भी की सोहन जहाँ भी हो ऐसे ही चुटकले सुना रहा हो। चाकू सर भी खुश हो।

Parul said...

जब हम कुछ खो रहे होते हैं तो खोना देख नहीं पाते।....sach hai:(

अभिषेक ओझा said...

सोहन की कहानी तो अपनी ही लगी... मेरे भी एक स्कूल के मित्र हैं.. ८ साल हो गए, उनके जीजाजी अध्यापक थे.. उनके स्कूल फ़ोन करके उनके घर का फिर अपने मित्र का नंबर पता किया फोन पर एक दिन बात हुई... मिलने का इरादा है पर फ़ोन पर कुछ वैसा ही हाल था जैसा आपकी मुलाक़ात का....

Gyandutt Pandey said...

सोहन जैसे बहुत होते हैं। एक मित्र को मैने इण्टरनेट पर ढ़ाई दशक बाद खोजा। पर अब वह बात नहीं। फोन नम्बर है पर होली-दिवाली भी दिआ सलाम नहीं होती।
जीवन में पत्ते झरते जाते हैं। नये भी आते हैं पर पुराने, नये कम ही बनते हैं!

swati said...

aapki koi koi baat bahut acchi lagti hai....khas kar ye ki jab hum kuch kho rahe hote hai to samajh nahi paate ki kho rahe hai...shashwat satya

DR.ANURAG said...

वो जो एक लम्हा पीछे छूट गया .....
मेरे सीने में रोज धड़कता है.....


देखिये आपकी यादो की दराज ने हमें एक शेर लिखने पर मजबूर कर दिया...यही जिंदगी है महेन जी.....रोज दाराज खोल कर झांक ले....ओर दिन की मशक्कत में निकल पड़े....यही यादे तो इन्सान को जिंदा रखती है....

Manish Kumar said...

सच कहा यादें सब के लिए कीमती होती हैं। पहली बार पढ़ा आपको अच्छा लगा।

Rohit Tripathi said...

School ke dost sabhi jaise woh school mein hua karte the woh baad meinw aise kaha rah jate hai.. kaha rah jata hai woh Alhad swabhaav.. sach bahut yaad aate hai woh din

We learnt,
We enjoyed,
We played,
We won,
We lost,
We laughed,
We cried,
We fought,

When we were in those days we never realized that this is only the “Golden days” which we were spending.

When we reached college we realized the value of “Golden School Days”.

When we were in college, we never realized that this is only the “Happy College days” that were spending and now when out of college we miss those days.

No matter how busy we are, we shall never forget to live the life that still exists... "

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