Tuesday, 1 July 2008

मेरे पास तुम्हारे बालों में खोंसने के लिये चाँद नहीं है


मेरे पास तुम्हारे बालों में खोंसने के लिये चाँद नहीं है
न ही मैं कोई उपमान गढ़ सकता हूँ
तुम्हारी देह की गोलाईयों पर
अपने रुक्ष नखों से तुम्हारी देह की स्निग्धता पर
खजुराहो के मंदिर तो ढाल सकता हूँ
लेकिन रिक्त ही रह जायेंगे मुझसे उनके शिला-लेख
इसलिये कि मेरा प्रेम तो ठेठ गँवई और अनपढ़ है

तुम्हारी पिंडलियों में जो मछलियाँ लहराती हैं
उन्हें मैं अपने पोरों से सहलाकर
तुम्हारे बदन में चिंगारियाँ तो भर सकता हूँ
पर नहीं जानता वे जादुई शब्द
जिन्हे सुनकर तुम्हारे जिस्म में उठने लगें लहरें
और तुम मुझे वे मछलियाँ दे दो
मेरा आदिम प्रेम तो पोरों पर गूँगा बैठा है

तुम्हारा पार पाने के लिये
मैं वसनहीन सागरमाथा तो लांघ सकता हूँ
पर जिन कृमिजा तन्तुओं में बाँधा जाता है प्रेम
उन्हे साधना तो मैनें सीखा ही नहीं
मेरा प्रणवजाल तो एक ही वाक्य में सिमट जाएगा

वह भाष्य भी निर्लब्ध है मेरे अप्राज्ञ राग को
जिससे तुम्हे प्रतीति हो
कि स्पर्श जो प्रेम रच सकता है वह काव्य नहीं
और निर्वाक्य अधरों पर भी बजती है दैहिक रंजनी

11 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी क्या कहूँ???????????????????????
मेरा प्रेम तो ठेठ गँवई और अनपढ़ है।
अजी बहुत अच्छा। आज भी पिकासो की कही बात पर अमल करते हुए बस पढे ही जा रहा था। लगता है हमे तो उनकी कही बात पर ही अमल करना पडेगा।

अभिषेक ओझा said...

ठेठ गँवई और अनपढ़ प्रेम ही तो असली प्रेम है !

निर्वाक्य अधर और झुकी आँख जो कह जाय उसे कहने की क्षमता शब्दों में कहाँ !

Udan Tashtari said...

जिससे तुम्हे प्रतीति हो
कि स्पर्श जो प्रेम रच सकता है वह काव्य नहीं
और निर्वाक्य अधरों पर भी बजती है दैहिक रंजनी

--यह बात है...शब्दों का जाल और उसमे उलझे गहन भाव!! सही जा रहे हैं.

श्रद्धा जैन said...

वाह क्या बात कहे दी जैसे प्रेम पराकाष्ठा लिख दी हो
मैने हमेशा ही ये माना है की जब प्रेम का सागर बहता है तो उसे शब्दों में नही लिखा जा सकता
उसके लिए स्पर्श की भाषा ज़रूरी है
आपकी कविता ने दिन बना दिया

E-Guru Maya said...

हे अनपढ़ महाराज, कृपया मुझनादान को कृमिजा और अप्रग्य का अर्थ समझाइये.

Neelima said...

बहुत प्यारी कविता ! शब्दों का संयोजन लय-भरा है !

DR.ANURAG said...

और तुम मुझे वो मछलियाँ दे दो
क्योंकि मेरा आदिम प्रेम तो पोरों पर गूँगा बैठा है
वाह गुरुवर आपका प्रेम भी ज्ञान से भरा हुआ है......ऐसे याचना करेंगे तो कौन इनकार करेगा ....वैसे कविता बहुत सुंदर है.....

महेन said...

इतने ध्यान से पढ़ने के लिये आप सभी को धन्यवाद।
ई-गुरु माया जी कृमिजा और प्राज्ञ का अर्थ क्रमश: रेशम और मूढ़ होता है।
अनुराग जी आदमी या तो प्रेम कर सकता है या प्रेम की बातें… आजकल मैं दूसरे वाले काम में व्यस्त हूँ क्योंकि देवी जी के पास नहीं हूँ। :)
अफ़सोस कि जब शादी नहीं हुई थी तब किसी के लिये प्रेम कविताएँ नहीं लिखीं। ;)

अखिल तिवारी said...

waah bhai jaan. kya baat hai. aisi solid kavita likhi hai ki kya bolun. ek baar padhi to bas padhta hi rah gaya.
maan gaye bandhu. likhte rahiye. kasam se.. chha gaye tussi..

Ravindra Das said...

aakanksha aur ichchha dvandva hi to kavita hai jise badi khoobsoorati se nidhaya.kya kahun log to bura maanane ko baithe rahte hai,par kavita me kavi jyada hi shamil hai.....

महेन said...

रविंद्र जी,
आपने सही कहा कि यहाँ कविता में कवि ज़्यादा ही शामिल है। सर्जक और भोगने वाले में जो अंतर होता है उसे मैं निभा नहीं पाया क्योंकि जितना मैं कुछ महीनों से भोग रहा हूँ उतना सब मात्र कुछ पंक्तियों में रूपांतरित कर पाना मेरे लिये संभव नहीं हो पाया, वह भी प्रेम जैसे जटिल विषय पर।
मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा हूँ यहाँ बैठे हुए। यहाँ कौन है जो आपसे रूठकर बैठा है? मैं हूँ न ब्लोग-जगत का अवन्ति… निश्चिंत रहें। :)