Wednesday, 4 June 2008

इंतज़ार

सबसे पहले इंतज़ार होता है
जब प्यार अभी अपना रास्ता
खोज ही रहा होता है
सुबह आँखें खुलते ही
हाथों में
इंतज़ार का कलेंडर
तैयार मिलता है
वह गुफ्तगू भी उसमें दर्ज होती है
जो शायद कभी की ही ना जाए
गाड़ी रोककर उस बस स्टैंड पर
की गई मुलाक़ात
जहाँ से उसने आज तक बस पकड़ी ही नहीं

सुबह और अंधेरे के बीच
बार-बार दरवाज़े तक दौड़ती निगाहें
इंतज़ार ही तो हैं
रात में भी नींद में भीगकर
चेहरे पर खिंच आई मुस्कराहट
क्या वह बिल्कुल अर्थहीन है?
मैं नहीं सोचता इंतज़ार कैसा है
एक संदेश, एक फ़ोन, एक मुलाक़ात
या शायद सिर्फ़ एक पोस्टकार्ड
बेचैन कदमों की आहट
या उदिग्न ह्रदय की चहलक़दमी

सिर्फ़ वे ही तो धुरी होते हैं
हमारी ज़िंदगी की
जिनका हमें इंतज़ार होता है
मगर जाने किस अनबुझ
रासायनिक प्रक्रिया से गुज़रकर
यह बदल जाता है अपेक्षा में
जब दो होंठ बुदबुदाते हैं
"मुझे तुमसे प्यार है"

अबकी शाम प्यार का जश्न मनाया जाएगा
जब इंतज़ार
अपनी गिनी-चुनी साँसे भी ले चुका होगा
इसके बाद क्या बचेगा
इंतज़ार के पास देने को
और क्या बचेगा प्यार के पास पाने को
इससे तो बेहतर है
इंतज़ार कभी ख़त्म ही ना हो

2 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है, उम्मीद है यहाँ आपके सपने साकार होने में मदद मिलेगी..

हाँ, वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें.. शुभकामनायें

आशीष कुमार 'अंशु' said...

बहूत सुंदर कविता -

शुभकामना