Wednesday, 4 June 2008

इंतज़ार २

प्यार?
नहीं मैं तुम्हे प्यार नही करता

मैं वहाँ वक्त से १५ मिनट पहले पहुँचा था
जहाँ मिलने का कहकर तुमने कल शाम
रखा था फोन
उस शाम से इस समय तक
सिर्फ़ २४ घंटे ही थे
युग नही थे
तुम अलबत्ता घंटा भर देर से पहुंचीं
मगर उस एक घंटे में भी
सिर्फ़ ६० ही मिनट थे
युग नही थे

कल रात मैं सोया पूरी नींद
मुझे नहीं आए मुलाक़ात के सपने
और न ही ध्यान हटा काम से मेरा
कॉफी हॉउस की उस टेबल पर बैठा
मैं नहीं था किसी भी तरह उतावला
खिड़की से बाहर
मेरी आँखें
नहीं जोह रही थीं किसी की बाट
मैं तो आराम से
चाय की चुस्कियों के बीच
धीरे धीरे
लिख रहा था एक कविता

मैं नही जानता
क्या सोचते हैं
प्यार के बारे में
इस दुनिया के लोग
लेकिन
क्या यह इतना साधारण हो सकता है?

1 comment:

शायदा said...

साधारण या असाधारण की परिभाषा में कैसे बांधा जा सकेगा उसे......। कविता अच्‍छी लगी।