Monday, 16 June 2008

एक रात जागेश्वर की

कितने दिन बीते
चाँदनी में लकदक
और लिपटी
वह रात
मगर फिर भी
अब तक
मेरी आँखों की गोलाइयों में
शांत तिर रही है

घुट अंधेरे में
मलाई सा लिपटा
चाँद और उसकी
चम्पई चाँदनी
यूँ बिछ गये थे
देवदार के पत्तों पर
कि इक हूल सी उठी थी
मन में
छोटी सी दूधिया नदी
ज्यों गोल चिकने पत्थरों से चिपककर
बहना भूल गई थी दम भर
कहीं दूर
बर्फ़ के फ़ाये
अब भी सुलगते चूल्हे को
मरहम कर रहे थे
ठिठुरता धुँआ
डरते-डरते ढूँढ रहा था
हवा में
अपना रस्ता

अधखुले किवाड़ों से
लपककर वह धुंधली उजास
मेरी बाजुओं को थाम
मेरे पैताने पसर गयी
हौले-हौले
मेरी आँखों में चढ़कर
बस गयी मेरे भीतर
और ढक लिया मुझे
अपनी दोरंगी चादर में

वह तरल उजास
सांस भर पी मैनें
और पोटली में बांध
ले आया था अपने साथ

कितने साल गुज़रे
और अब भी हर रात
मै उस रात को
ओढ़ रहा हूँ
बिछा रहा हूँ

8 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

mahashakti said...

आपकी बतियॉं, काफी अच्‍छी लगी , आज पहली बार आया हूँ दोबारा फिर आऊँगा।

काकेश said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आया. वाह पूरा खजाना है. जागेश्वर और ना जाने कितनी यादें ताजा हो गयी. फुर्सत से पढ़ता हूँ.

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुन्दर अनोखी रात।

अभिषेक ओझा said...

क्या रात थी.... बहुत खूब ! यूं ही ओढ़ते रहें.. बिछाते रहें !

Parul said...

छोटी सी दूधिया नदी
ज्यों गोल चिकने पत्थरों से चिपककर
बहना भूल गई थी दम भर
कहीं दूर
बर्फ़ के फ़ाये
अब भी सुलगते चूल्हे को
मरहम कर रहे थे
baar baar padhi..khiltii raat

swati said...

बहुत सुंदर...सशक्त ..

vijay gaur said...

आपकी कविताओं में एक खास तरह का भूगोल और उससे एक तरह का जुडाव जिस संवेदनशीलता के साथ आता उससे कविताओं में एक ताजगी सी दिखायी देती है. अच्छी कवितायें हैं, अभी तक जो भी पढीं.निरंतरता बनी रहे, मेरी शुभकामनायें.