Tuesday, 24 June 2008

प्रेम के आख़री दिन

कुम्हार के चक्के में
जैसे घूमती है मिट्टी
वैसे ही
तुम्हारे दायरे में घूमता है मेरा होना
तुम्हारे बालों से टपकता है बूँद-बूँद
मेरा अस्तित्व
अजाने भय से आशंकित सुहागनें
अपने पति और बच्चों की
मंगलकामनाओं के लिये
जिसपर रोली की तरह
लपेटती हैं मुझे
पीपल का वह पेड़ हो तुम
मैं संचरित होता हूँ
तुम्हारे आस-पास
जैसे कविता के गिर्द
बुने जाते हैं शब्द
या शब्दों के गिर्द
बुनी जाती है कविता
लुटिया में जैसे
ढलता है पानी
वैसे ही
आकार लेती हो तुम
मेरे भीतर

संभव है कभी
चक्का और मिट्टी
पीपल और रोली
कविता और शब्द
लुटिया और पानी
न रहें
किंतु तब भी क्या
उनका सघन संकुल-संबन्ध
बजता नहीं रहेगा
व्योम-व्याप्त वीणा की तरह

तो कहो सुभगे
जीवन के इन आख़री दिनों को
प्रेम के आख़री दिन कैसे कह दिया तुमने?

6 comments:

शायदा said...

तो कहो सुभगे
जीवन के इन आख़री दिनों को
प्रेम के आख़री दिन कैसे कह दिया तुमने?

सही कहा, कोई भी दिन प्रेम का आखि़री दिन कैसे हो सकता है, हो ही नहीं सकता।

सजीव सारथी said...

प्रेम तो व्योम व्याप्त है और रहेगा.....आपकी कविता और भाव सशक्त हैं

vijaymaudgill said...

सच कहा आपने प्रेम का आख़िरी दिन नहीं हो सकता। बहुत बढ़िया रचना है आपकी अच्छा लगा पढ़कर।
तुम्हारे दायरे में घूमता है मेरा होना। क्या बात है।
शुभकामनाएं।

सुशील कुमार छौक्कर said...

कुम्हार के चक्के में
जैसे घूमती है मिट्टी
वैसे ही
तुम्हारे दायरे में घुमता है मेरा होना
तुम्हारे बालों से टपकता है बूँद-बूँद
मेरा अस्तित्व

सच में यार गजब ढा रहे हो। चाक की मिट्टी, बालों की बूँद, लुटिया का पानी,पीपल, रोली, सुभगे आदि । बहुत सुन्दर,दिल को छूने वाला।

अभिषेक ओझा said...

शास्वत प्रेम की अनुभूति कराती सुन्दर अभिव्यक्ति.. !

Pratyaksha said...

अच्छा लिखा !