Thursday, 12 June 2008

खेल जो हम एक-दूसरे से खेलते हैं

मैं जब दरी पर लेटकर
ताकता हूँ छत को एकटक
तो कान में तिनका डालकर
सताने आ जाती हो तुम मुझे
अपनी चुप्पी से भी ज़्यादा
तुम्हे मेरी शांति अखरती है
नहीं, असल में तुम्हें डर लगता है
कहीं मैं कविता लिखते-लिखते
गाँव के बाहर झौहड़ में छलांग न मार दूँ
कविता करने वाले पागल होते हैं
यही बताते थे न तुम्हारे बाबा तुमको

जब मैं शब्दों से उकेरने लगता हूँ
पेड़, पहाड़, नदी, दूब और बादल
तुम कूद पड़ती हो पेंटिंग में
बिखेर देती हो अक्षर-अक्षर सारे कमरे में
तुम्हें डर लगता है
कहीं मैं उस पेंटिग में
बांसुरी बजाने वाला गडरिया न बन जाऊँ

मेरी खीझ और झिड़कन तुम्हें
अपनी पसंदीदा धारावाहिक से भी ज़्यादा पसंद हैं
ऐसा कहती हो तुम पेंटिंग से बाहर निकलकर

फिर मिलकर बुहारते हैं हम पूरा घर

तुम्हारे डर और मेरी खीझ के बीच
इस बुहारन में हम हमेशा
कमरे में ही छोड़ देते हैं हमारे हिस्से का प्यार

5 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

तुम्हें मेरी शांति अखरती है
नहीं, असल में तुम्हें डर लगता है
कि कहीं मैं कविता लिखते-लिखते
गाँव के बाहर झौहड़ में छलांग न मार दूँ
दोस्त तुमने ये जज्बात कैसे पकड़ लिया। सच में दिल खुश हो गया। झौहड़ में कभी नाहये भी हो? मुझे अपना बचपन याद आ गया।
तुम्हारे डर और मेरी खीज के बीच
इस बुहारन में हम हमेशा
कमरे में ही छोड़ देते हैं हमारे हिस्से का प्यार

वाह वाह वाह................

अभिषेक ओझा said...

बहुत बढ़िया भाई... दिल खोल के लिखी जा रही हैं लाइने.

महेन said...

ब्लॉग पर आने के लिये आप को अनेकानेक धन्यवाद। ये सब बीवी से दूरी का चमत्कार है भईया।

Pratyaksha said...

इसे पढ़ने में आनंद आया .. आज ही आपका ब्लॉग देखा .. पढ़ रही हूँ और भी सब

poemsnpuja said...

khoobsoorat shabdchitra hain...accha laga padh kar