Sunday, 8 June 2008

एक अनंत प्रेम-कथा

चूल्हा सुलगाया उसने एक प्रेम-पत्र से
जिसे लिखा था किसी ने उसके नाम
अपने अलस सवेरे के सपनों में बार-बार
फिर गागर भर लाई उस तालाब से
जहाँ कदम्ब के नीचे किसी की भावुक आकांक्षा
देना चाहती थी उसे एक चुंबन
संदूक में तरतीब से बिछाए उसने कपड़े
जैसे किसी ने बुन दिया था उसका नाम
तकिये में गुँथी रुई में
लोरी गाकर सुला रही थी वो
उस बच्चे को जिसमें
देखना चाहता था कोई अपना अक्स
देहरी पर बैठ काढ़े उसने अपने लम्बे बाल
जिन्हे ओढ़कर सो रहा है आज भी कोई
जीने के लिये दो घड़ी उसके साथ

रात में जब एक जिस्म हमबिस्तर हुआ उसका
उसने शिद्दत से याद किया
एक प्रेम-पत्र
एक चुम्बन
तकिये में गुँथा एक नाम
एक अक्स बच्चे में
और अपने बालों में उलझा एक चेहरा

इस तरह पूरी की
उसने अपनी अनंत प्रेम-कथा

2 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

इस प्रेम शब्द से बहुत प्यार है मुझे। आपकी इस कविता को बार बार पढ़ रहा हूँ हर बार एक नया अहसास दिला रही है। क्या कहूँ कैसी है बस बार बार पढ़ने को जी कर रहा है। और इसकी आत्मा को देखने को चाह रहा हूँ पर देख नही पा रहा हूँ।

Pratyaksha said...

अनंत और उदास !