Friday, 6 June 2008

नदी जो उसकी आँख से बहती है

वो जिसे छोड़ आया था
रोते हुए धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते
वो मेरे साथ चली आई थी
हज़ारों मील

आज भी ताज़ा हैं
गीली लकड़ी से सुलगते आँसू
मैं हैरान हूँ देखकर उनकी लकीरें आईने में

याद करना चाहता हूं उसे
जो नदियाँ रो चुकी है अब तक
टटोलकर घुप अन्धेरे में फोन
और माँ की नींद
वह करती है किसी को फोन
और सुबुकती रहती है हौले-हौले
बात नहीं करते वे दोनों
कितना बेमानी लगता है बोलना कई बार
जब शब्द भी भूल जाते हैं अपना मतलब

मुझे याद आते हैं तितली से मचलते ओंठ
जो छ्त के एक कोने में बैठ
बुदबुदा रहे हैं कोई नाम
मेरे दिमाग में पैठकर
किसी की हँसी बोल देती है हल्ला
तितली
बैठ गयी है डरकर किसी और ठौर
धुल गया है वो चेहरा
जो हज़ारों मील चला आया था
मेरे साथ

फ़टी कमीज़ की जेब से निकल आया
एक चिथड़ा ख़त
जिसका अक्षर-अक्षर प्यार में डूबकर भरभरा गया था
अब पढ़ नहीं पाओगे उसे
वो आँखें भी तो वहीं छोड़ आये थे
लिखा गया था जिनके लिये यह ख़त

डर लगता है सोचकर
क्यों लाया सिर्फ़ एक चिथड़ा प्यार
जानता तो पूरा समंदर ले आता
जिसे भर रही हैं आज भी
उसकी आँखों में बहती झीलें

रह-रहकर फड़फड़ाता है अब भी
कमरे के कोने में धूसरित सा चिथड़ा प्यार

3 comments:

poemsnpuja said...

wow!!!kamaal ka likhte hain aap...behtarin...lagta hai kisi legend ko padh rahi hun.
amazing...ummid hai aap aur bhi likhenge

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह क्या बात है क्या खूब लिखते हो यार दिल खुश कर दिया। दिलचस्प आदमी के साथ यार आप बहुत पहुँचे हुए निकले।

Shefali said...

ya yo se la musa de este poema. soy yo. y tambien se cuanto me quieres. no tengo palabras para apreciar tu poema, como no hay palabras para describir amor.