Wednesday, 4 June 2008

पेड़ और मैं

मैंने नहीं देखा
अपने घर के आगे खड़ा वह पेड़
उसमें किस रंग के फूल खिलते हैं
क्या मालूम
कौन जाने वह
कब रहा होगा ठूंठ

एक सुंदर सा घोंसला बनाया है
उसमें गौरैया ने
कहता है मेरा बेटा
कितनी मेहनत लगी गौरैया की
मैंने नहीं लगाया हिसाब
फल गिरते हैं उसके हर साल
मेरे आँगन में
मेरे पास नहीं है वक्त
उन्हें समेटने का

इसे कटवा देंगे
कहती है मेरी बीवी
इससे भर जाता है आँगन में कूड़ा
दिनरात शोर मचाती हैं
इसपर डेरा डाले चिडियां
और इसकी जड़ें खतरा भी तो हैं
घर की नींव के लिए
मैं हिला देता हूँ हामी में सिर
जैसे पेड़ हिलता है हवा में
और डूब जाता हूँ अपने काम में

आने वाले संकट से बेख़बर
पेड़ और मैं
खुश हैं
और हरे भरे हैं अभी तक।

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